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   The Soul Of Ravindra 

1926 में, कवि रवींद्रनाथ टैगोर ने ढाका विश्वविद्यालय में एक गहरा चिंतनशील पता दिया, जिसका शीर्षक “कला का अर्थ” है। इसमें, उन्होंने एक बड़े पैमाने पर उद्घोषणा में एक स्कूल-भवन की दीवार पर बड़े शब्दों में लिखा था – ‘बिपिन एक अहंकारी गधा है!’ और इससे उन्हें इस :प्रश्न का उत्तर मिला – कला क्या है। ” दुनिया और उनके जीवन के सभी विवरणों में, भित्तिचित्र के लेखक ने यह उजागर करना आवश्यक समझा कि उन्हें बिपिन नामक एक लड़के के बारे में ऐसा महसूस क्यों हुआ ? क्योंकि, रवींद्रनाथ ने कहा, जबकि बिपिन का कद या स्वास्थ्य की स्थिति हमारे लिए कोई अंतर नहीं रखती है, लेकिन “जब हम उनसे प्यार करते हैं या उनसे नफरत करते हैं, तो बिपिन के अस्तित्व का हमारे मन  की पृष्ठभूमि परअधिक स्पष्ट हो जाता है। तब हमारा मन अब तटस्थ नहीं रह सकता; यह बिपिन के विचार से अलग है जो हमारे लिए गैर-महत्वपूर्ण है, और अपनी शक्ति के अनुसार हमारा मन उसे दूसरों के लिए अपरिहार्य रूप से वास्तविक बनाने की कोशिश करता है जैसा कि वह हमारे लिए है। “

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 यहां कहानी को एक विराम देते हैं – 

 ट्रैक्टेटस लोगिको-फिलोसॉफिकस में, महान 20 वीं शताब्दी के ऑस्ट्रियाई-ब्रिटिश दार्शनिक लुडविग विट्गेन्स्टाइन ने तर्क दिया कि कला, नैतिकता और धर्म उन मूल्यों के एक दायरे का संचार करते हैं जो भाषा में प्रतिनिधित्व की पहुंच से बाहर स्थायी रूप से निहित हैं। उसका मतलब यह नहीं था कि हम कला का वर्णन नहीं कर सकते; वास्तव में, विट्गेन्स्टाइन स्वयं संगीत और अन्य कलाओं के बारे में मजबूत राय रखते थे, और शायद एकमात्र दार्शनिक थे जिन्होंने वास्तव में एक घर,  सुंदर डिजाइन किया था जो अब वियना में बल्गेरियाई दूतावास के रूप में कार्य करता है।

क्या आप समझने की कोशिश कर रहे हैं, ?  

यह सबका मतलब ? 

अभी थोड़ा और – 

 मान लीजिए कि आप इसे समझ गए हैं; क्या आप उस सामग्री को चित्रित कर  सकते हैं जिसे आपने शब्दों में समझा है? क्या शब्द उस अर्थ को कैप्चर करेंगे जो आप उस अनुभव से बनाते हैं, या ऐसा कुछ होगा जो उसके अर्थ पर छोड़ दिया जाए, जिसे शब्दों में कैद करना असंभव है? यह क्या है कि हम कला के साथ अपने मुठभेड़ों में घुसते चले जाते  हैं?

क्या आप कला  के किसी एक टुकड़े से टकरा गए हैं, जिसे आप बिल्कुल नहीं समझते हैं, लेकिन जो आपको दिनों तक नहीं छोड़ता है?  हम इसे बार-बार कैसे सोचते  हैं, इसे किसी तरह से मास्टर करने की कोशिश करते हैं, आखिरकार कोशिश कर कर के ,सभी के लिए इसे पचा लेते हैं ताकि आप अपने जीवन के साथ आगे बढ़ सकें। और वह विचार एक धरोहर बन जाती है शायद इसका मूल्याङ्कन करना सहज नहीं।  

अब हम ऊपर की कहानी पर आगे बात करते हैं – 

उपर्युक्त कहानी को , रवींद्रनाथ दार्शनिक ज्ञान का एक बड़ा हिस्सा मानते हैं, 

‘रस’ सिद्धांत पर लगभग लापरवाही से ड्राइंग करते हैं, और महान मध्यकालीन कश्मीरी तांत्रिक और एस्थेटिशियन अभिनव गुप्ता – के असाधारण से असाधारण मन के साथ गूंजते हैं। जहाँ रवींद्रनाथ मनुष्यों के बीच कलात्मक आत्म-अभिव्यक्ति की विभेदक शक्तियों को छूते हैं, उन्हें लगता है कि वह प्रतिभा सचमुच, किसी चीज़ की उपस्थिति या प्रतिमान बनाने की रहस्यमय क्षमता के बारे में सोच रही है जो कि  सिद्धांतवादी प्रदान करते हैं। रवींद्रनाथ के अनुसार, किसी भी चीज़ की कल्पना करने और बनाने की क्षमता- एक पेंटिंग, एक स्कूल, एक पड़ोस कहीं से भी प्राप्त होती है – “वास्तविक बनाने की क्षमता”  न केवल एक विचार है जो न केवल सबके  पास है, बल्कि उसके स्वयं के व्यक्तित्व को भी प्रदर्शित करता है। इसमें जो काम होता है, उसके माध्यम से संभावनाएं निहित होती हैं। कला बनाना, विशेष रूप से, एक ऐसे माध्यम से निपटना शामिल है जो “एक विचार” की प्रस्तुति को संभव बनाता है जो अक्सर निर्माण के कार्य से पहले अस्पष्ट होता है, लेकिन जो चुने गए माध्यम द्वारा वहन किए गए वाक्यविन्यास और प्रतीकात्मक संभावनाओं के माध्यम से पूरी तरह से उभरता है। ।

साहित्य में व्यवहार्यता और अर्थ की व्यावहारिकता के बारे में संदेहपूर्ण दावे ऐतिहासिक साहित्य के साथ रवींद्रनाथ टैगोर के विचारों पर आधारित हैं, जो साहित्य की कला पर वास्तविकता को रोशन करने और महसूस करने को समृद्ध करते हैं। उत्तर आधुनिक तरीकों और सिद्धांतों के परिणाम को कला और जीवन की रक्षा के संदर्भ में एक एकता के रूप में देखा जाता है जो अद्वितीय ज्ञान और अंतर्दृष्टि को बढ़ाता है। हालांकि पश्चिमी संस्कृति से प्रभावित होकर, उन्होंने कला के लिए लागू सिद्धांत पर अविश्वास किया। 

कलाकार के निर्माण के बंधे हुए चरित्र के बारे में कहने के लिए रवींद्रनाथ के पास बहुत कुछ है। स्कूल की दीवार पर भित्तिचित्रों के लेखक के लिए  कहा जा सकता है कि उन्होंने गरीब बिपिन पर अपने गुस्से को यादगार और संक्षिप्त भाषा में व्यक्त करते हुए कुछ “औपचारिक” सीमाएं दी थीं, लेकिन यहाँ  रवींद्रनाथ के दिमाग में, कलात्मक उत्पादों की औपचारिक सीमा –  ईश्वरीय निर्माण के लिए सही सादृश्य को वहन करती है। अद्वैत वेदान्त के सिद्धांत की अपनी व्याख्या पर, ब्रह्म, एकात्मक सैद्धांतिक सिद्धांत में -जो ब्रह्मांड का आधार है, जब हमारे द्वारा ब्रह्मांड के “निर्माता” के रूप में वर्णित किया गया है, तो वह  “नाम और रूप” से  वर्णित किया गया है  जबकि एक ही समय में यह उससे पार भी है । लेकिन अपने आप में ब्रह्म अनिर्वचनीय, या असंभव है, क्यों कि वे निर्गुण को या गुणों से रहित वर्णन नहीं किये जा सकते । यह केवल तभी है जब इसे दुनिया के रूप में प्रस्तुत किया जाता है – या खुद को दुनिया के रूप में व्यक्त करता है, अपनी पसंद के किसी भी महान कलाकार , अपनी कला से  ईश्वर की  सेवा करता है – कि यह हमें सगुण ब्रह्म के रूप में उपलब्ध हो जाता है । इस सादृश्य को उजागर करने वाले एक काव्य- में,  रवींद्रनाथ कभी-कभी भगवान को संबोधित करते हैं, –  ‘God as guṇī’   जिसे आमतौर पर महान कलाकारों का वर्णन करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। यह मनोरम दृश्यावली “श्रावण संध्या” नामक एक बंगाली निबंध में काव्यात्मक रूप से विकसित की गई है, जहाँ रवींद्रनाथ ने हमारे दिलों में प्रिय की जबरदस्त प्रविष्टि के रूप में भारी बारिश की घनिष्ठ, अंतरंग ध्वनि का वर्णन किया है। मानसून की शाम को, वह देखता है, एक गीत के लिए प्रवचन देता है; इसका कारण यह है कि बारिश की आवाज़ के रूप में व्यक्त किया गया –  “स्वामी” के रूप में नहीं, बल्कि “प्रिय” के रूप में – एक तरह से एक स्वीकार्यता। भारतीय कवि और गीतकार कहते हैं, की इन शब्दों में  रवींद्रनाथ ने मानसून की बारिश के सौंदर्य महत्व को समझा है। यह एक तरह का एब्स्ट्रेक्ट चित्रण है।  

टैगौर  के काव्यात्मक आसमान के लिए  कोई परिचय की आवश्यकता नहीं है। वह ठीक है कि वे प्रेम के कवि के रूप में जाने  जाते  हैं ; उन्हें रोमांटिक कवि के रूप में  व्यक्त किया जाता है।  उनकी रचनाओं में इतनी खूबसूरती से विचार जो सरल होने के अलावा हमेशा समाज के लिए एक संदेश देते हैं । संध्या संगीत और प्रभात संगीत  उनकी अच्छी तरह से प्रकाशित रचनाएँ हैं, और उनकी अमर रचना गीतांजलि। वह भारत के सच्चे पुत्र थे जिनसे की पुरानी  पीढ़ी

आज की पीढ़ी और आज की पीढ़ी ने बहुत कुछ हासिल किया। वह एक संस्था थी

ने और और आज की पीढ़ी ने बहुत कुछ प्राप्त किया।   अपने कामों से उन्होंने खुद को भारत के इतिहास में हमेशा के लिए अंकित कर  दिया है।

👉क्या ये ब्लॉग किसी भी प्रकार से आपके लिए सहायक है या आपके सुझाव इस विषय में क्या हैं  … और आप आगे किन विषयों पर ब्लॉग पढ़ना चाहते हैं  … कृपया अपने महत्वपूर्ण सुझाव दीजिये 🙏

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इंडियन ट्रेडिशनल आर्ट 

हर राष्ट्र अपनी कुछ अलग पहचान रखता है और उसको विशेष रूप से उसकी कला माध्यम से जाना जा सकता है।  भारतीय कला यहां की प्राकृतिक , सांस्कृतिक, प्रान्तिक और धार्मिक चिन्हों को लेकर अपनी पहचान बनाती है।  इसके लिए हम भारत के प्रान्तिक ( ट्रेडिशनल ) कला को समझना होगा।  

भारतीय कला में यहां की ट्राइबल और फोक कला सम्मिलित होती है।  भारतीय कला के ज्वेलरी , स्टेचू , पेंटिंग, हेंडीक्राफ्ट सम्मिलित होते हैं जो भौगोलिक रूप से विभिन्न क्षेत्र में विकसित हुईं।  

भारतीय कला को समझने के लिए हमें लगभग सभी इंडियन ट्रेडिशनल आर्ट को बारीकी से देखना और समझना पड़ेगा – उसमें किस प्रकार से कलात्मक डिटेल की गई है।  क्या कलर यूज़ हुए हैं।  उनके पीछे क्या कहानियां हैं और उसकी धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व क्या है।  इसके लिए पीला हम विभिन्न कलाओं को देख समझ लेते हैं।  

भारत की लोक चित्रकला

भारत के विभिन्न – क्षेत्र या स्थान की जातियों व जनजातियों में पीढी दर पीढी चली आ रही पारंपरिक कलाओं को लोककला कहते हैं। भारत जैसें देश में विभिन्न प्रान्तों में विविध रूपों में लोककला देखी जा सकती है। जो विभिन्न नामों से जानी जाती है, जिसकी चर्चा नीचे की गयी है।

1. राजस्थानी चित्रशैली / राजपूत पेन्टिंग

 राजस्थानी चित्रशैली का पहला वैज्ञानिक विभाजन आनन्द कुमार स्वामी ने किया था। उन्होंने 1916 में ‘राजपूत पेन्टिंग’ नामक पुस्तक लिखी। उन्होंने राजपूत पेन्टिंग में पहाड़ी चित्रशैली को भी शामिल किया। परन्तु अब व्यवहार में राजपूत शैली के अन्तर्गत केवल राजस्थान की चित्रकला को ही स्वीकार करते हैं। वस्तुतः राजस्थानी चित्रकला से तात्पर्य उस चित्रकला से है, जो इस प्रान्त की धरोहर है और पूर्व में राजपूताना में प्रचलित थी।

भारत में राजस्थानी चित्रकारी की कला का प्रारम्‍भ मुगलों द्वारा किया गया जो इस भव्‍य अलौकिक कला को फ़राज (पार्शिया) से लेकर आए थे। छठी शताब्‍दी में मुगल शासक हुमायुं ने फराज से कलाकारों को बुलवाया जिन्‍‍हें लघु चित्रकारी में विशेषज्ञता प्राप्‍त थी। उनके उत्तराधिकारी मुगल बादशाह अकबर ने इस भव्‍य कला को बढ़ावा देने के प्रयोजन से उनके लिए एक शिल्‍पशाला बनवाई। 

2 . कालीघाट चित्रकला

इस चित्रकला का का उद्गम् लगभग 19वीं सदी में कोलकाता के कालीघाट मंदिर में हुआ माना जाता है। इस चित्रकला में मुख्यतः हिन्दू देवी-देवताओं तथा उस समय पारम्परिक किमवदंतियों के पात्रों के चित्रण विशेषतः देखने को मिलते हैं। प्राचीन समय में इस कला के चित्रकार विभिन्न देवी-देवताओं का चित्रण इस कला द्वारा लोगों को पट चित्र में गा-गाकर सुनाया करते थे। इस शैली की चित्रकला में चित्रकार लम्बे-लम्बे कागजों में रामायण, महाभारत व अन्य किम्वदन्तियों पर आधारित दृश्यों का चित्रण करते हैं तथा गाकर उस चित्रण का व्याख्यान करते हैं।

3 . फर्श चित्रकला (रंगोली  चित्रकला)

यह भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा और लोक-कला है। अलग अलग प्रदेशों में अलग-अलग नाम जाती है। इसे सामान्यतः त्योहार, व्रत, पूजा, उत्सव विवाह आदि शुभ अवसरों पर सूखे और प्राकृतिक रंगों से बनाया जाता है। यह उत्तर प्रदेश में चाक पूर्ण  उत्तराखंड में एपन ,राजस्थान में मंडाना; आंध्र प्रदेश में मगुल्लू; बिहार में अरिपाना; महाराष्ट्र में रंगोली; पश्चिम बंगाल में अल्पाना; गुजरात में अथिया; कर्नाटक में रंगवाली; तमिलनाडु में कोल्लम; हिमाचल प्रदेश में अरोफ; और केरल में कलमा जट्टू जैसे विभिन्न नामों से जाना जाता है।

4 . वर्ली चित्रकला

इस चित्रकला के नाम का संबंध महाराष्ट्र के जनजातीय प्रदेश में रहने वाले एक छोटे से जनजातीय वर्ग से है। ये अलंकृत चित्र गोंड तथा कोल जैसे जनजातीय घरों और पूजाघरों के फर्शों और दीवारों पर बनाए जाते हैं। वृक्ष, पक्षी, नर तथा नारी मिल कर एक वर्ली चित्र को पूर्णता प्रदान करते हैं। ये चित्र शुभ अवसरों पर आदिवासी महिलाओं द्वारा दिनचर्या के एक हिस्से के रूप में बनाए जाते हैं। इन चित्रों की विषयवस्तु प्रमुखतया धार्मिक होती है और ये साधारण और स्थानीय वस्तुओं का प्रयोग करके बनाए जाते हैं जैसे चावल की लेही तथा स्थानीय सब्जियों का गोंद और इनका उपयोग एक अलग रंग की पृष्ठभूमि पर वर्गाकार, त्रिभुजाकार तथा वृत्ताकार आदि रेखागणितीय आकृतियों के माध्यम से किया जाता है। पशु-पक्षी तथा लोगों का दैनिक जीवन भी चित्रों की विषयवस्तु का आंशिक रूप होता है। शृंखला के रूप में अन्य विषय जोड़-जोड़ कर चित्रों का विस्तार किया जाता है।

वर्ली जीवन शैली की झांकी सरल आकृतियों में खूबसूरती से प्रस्तुत की जाती है। अन्य आदिवासीय कला के प्रकारों से भिन्न वर्ली चित्रकला में धार्मिक छवियों को प्रश्रय नहीं दिया जाता और इस तरह ये चित्र अधिक धर्मनिरपेक्ष रूप की प्रस्तुति करते हैं।

5 . मधुबनी चित्रकला

यह मिथिलांचल क्षेत्र जैसे बिहार के दरभंगा, मधुबनी एवं नेपाल के कुछ क्षेत्रों की प्रमुख चित्रकला है। मधुबनी जिले के जितवारपुर गांव इस लोक चित्रकला का मुख्य केंद्र है। शुरुवाती दौर में यह चित्रकला रंगोली के रूप में विकसित हुआ फिर बाद में यह कला धीरे-धीरे आधुनिक रूप में कपड़ो, दीवारों एवं कागज पर उतर आई। मिथिला की औरतों द्वारा शुरू की गई थी।  

6 . पट्टचित्र कला

‘पट्ट’ का अर्थ ‘कपड़ा’ होता है। यह ओड़िशा की पारम्परिक चित्रकला है। इस चित्रकला में सुभद्रा, बलराम, भगवान जगन्नाथ, दशवतार और कृष्ण के जीवन से संबंधित दृश्यों को दर्शाया जाता है। शास्त्रीय भाषाओं के रूप में कौन कौन सी भारतीय भाषाओं को सूचीबद्ध किया गया है

7 . पिथोरा चित्रकला

यह गुजराती के राठवास और भील जनजाति के लोगों का पारम्परिक चित्रकला है। यह कला रूप के बजाय अनुष्ठान से अधिक है।

8 . कलमकारी चित्रकला

‘कलमारी’ का शाब्दिक अर्थ है कलम से बनाए गए चित्र। यह भारत की प्रमुख लोककलाओं में से एक है। क़लमकारी एक हस्तकला का प्रकार है जिस में हाथ से सूती कपड़े पर रंगीन ब्लॉक से छाप बनाई जाती है। क़लमकारी शब्द का प्रयोग, कला एवं निर्मित कपड़े दोनो के लिए किया जाता है। मुख्य रूप से यह कला भारत के आंध्र प्रदेश राज्य के कृष्णा जिले के मछलीपट्टनम एवं ईरान में प्रचलित है।

9. थांका चित्रकला

भगवान बुद्ध के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर आधरित चित्रकला को थंका चित्रकला कहते हैं। यह चित्रकला भारतीय, नेपाली तथा तिब्बती संस्कृति की अनुकाम मिसाल है। इस के माध्यम से तिब्बती धर्म, संस्कृति एवं दार्शनिक मूल्यों को अभिव्यक्त किया जाता रहा है। इस का निर्माण सामान्यत: सूती वस्त्र के धुले हुए काटल कार किया जाता है।

इस चित्रकला को आध्यात्मिक चित्रकला भी कहते हैं क्योंकि इस चित्रकला का विषय धार्मिक-आध्यात्मिक ही होता है। चूंकि यह भगवान बुद्ध के जीवन और उनकी शिक्षाओं पर आधरित चित्रकला होती है इसलिए इसे बौद्ध चित्रकला भी कहा जाता है।

10. लघु कला चित्रकारी( मिनिएचर आर्ट ) 

लघु चित्रकारी (Miniature painting) भारतीय शास्त्रीय परम्परा के अनुसार बनाई गई चित्रकारी शिल्प है। “समरांगण सूत्रधार” नामक वास्तुशास्त्र में इसका विस्तृत रूप से उल्लेख मिलता है। इस शिल्प की कलाकृतियाँ सैंकड़ों वर्षों के बाद भी अब तक इतनी नवीन लगती हैं मानो ये कुछ वर्ष पूर्व ही चित्रित की गई हों।

11. कांगड़ा चित्रकला 

कांगड़ा चित्रकला का विकास कचोट राजवंश के राजा संसार चन्द्र के कार्यकाल में हुआ। यह चित्रकला शैली दर्शनीय तथा रोमाण्टिक है।

पौराणिक कथाओं और रीतिकालीन नायक- नायिकाओं के चित्रों की प्रधानता कांगड़ा चित्रकला में है। गौण रूप में व्यक्ति चित्रों को भी स्थान दिया गया है।

इस चित्रकला शैली में सर्वाधिक प्रभावशाली आकृतियाँ स्त्रियों की हैं, जिसमें चित्रकारों ने भारतीय परम्परा के अनुसार नारी के आदर्श रूप को ही ग्रहण किया है।

कांगड़ा शैली के स्त्री चित्रों में सत्कुल को अभिव्यक्त करने वाले वस्त्र, चाँद-सी गोल मुखाकृति, बड़ी-बड़ी भावप्रवण आँखें, भरे हुए वक्ष, लयमान उंगलियाँ, मुख में छिपा हुआ रहस्यमय भाव सर्वत्र दृष्टिगोचर होते हैं। यह नितांत निजी शैली है, जिसकी विशेषता नारी- सौन्दर्य के प्रति अत्यधिक झुकाव है।

कांगड़ा चित्रकला शैली में प्राकृतिक, विशेषकर पर्वतीय दृश्यों का भी चित्रण किया गया है।

12. तंजौर चित्रकला

यह कला लोक कला और कहानी-किस्से सुनाने की विस्मृत कला से जुड़ी है। तंजौर की प्रसिद्ध चित्रकारी पारंपरिक कला का ही रूप है। इस कला ने भारत को विश्व मंच पर प्रसिद्धि दिलाने में महती भूमिका निभाई है।तंजौर चित्रकला का विषय मुख्य रूप से हिन्दू देवता और देवियाँ हैं। श्रीकृष्ण इनके प्रिय देव थे, जिनके विभिन्न मुद्राओं में चित्र बनाए गए हैं, जो उनके जीवन की अवस्थाओं को व्यक्त करते हैं।

तंजौर चित्रकारी की मुख्य विशेषताएँ उनकी बेहतरीन रंग की सज्जा, रत्नों और कांच से गढ़े गए सुंदर आभूषणों की सजावट और उल्लेखनीय स्वर्ण पत्रक का काम है।

13. गोंड कलाकृतियाँ

मध्यप्रदेश के मण्डल जिले की प्रसिद्ध जनजातियों में से एक ‘गोंड’ द्वारा बानायी गयी चित्र कला की विशिष्ट कलाशैली को गोंड चित्रकला के नाम से जाना जाता है। लम्बाई और चौड़ाई केवल इन दो आयामों वाली ये कलाकृतियाँ खुले हाथ बनायी जाती हैं जो इनका जीवन दर्शन प्रदर्शित करती हैं। गहराई, जो किसी भी चित्र का तीसरा आयाम मानी गयी है, हर लोककला शैली की तरह इसमें भी सदा लुप्त रहती है जो लोक कलाओं के कलाकारों की सादगी और सरलता की परिचायक है।

राजपूत चित्रशैली, भारतीय चित्रकला की प्रमुख शैली है। राजस्थान में लोक चित्रकला की समृद्धशाली परम्परा रही है। मुगल काल के अंतिम दिनों में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अनेक राजपूत राज्यों की उत्पत्ति हो गई, जिनमें मेवाड़, बूंदी, मालवा आदि मुख्य हैं। इन राज्यों में विशिष्ट प्रकार की चित्रकला शैली का विकास हुआ। इन विभिन्न शैलियों में की विशेषताओं के कारण उन्हे राजपूत शैली का नाम प्रदान किया गया।

* इस प्रकार भारत विविध कला के साथ साथ उससे जुडी हमारे ऐतिहासिक , सांस्कृतिक मूल्यों का भी विशेष महत्व रखता है।  

* जिस देश की कला जितनी समृद्ध होती है वैचारिक रूप से वह देश उतना ही समृद्ध होता है।  

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इंडियन ट्रेडिशनल आर्ट और आधुनिक कला

जीवन, ऊर्जा का महासागर है। जब अंतःचेतना  जागृत होती है तब उस जीवन ऊर्जा से  कला उभरती है। 

कला उस क्षितिज की भाँति है जिसका कोई छोर नहीं, इतनी विशाल इतनी विस्‍तृत अनेक विधाओं को अपने में समेटे, तभी तो कवि मन कह उठा-

साहित्‍य संगीत कला वि‍हीनः साक्षात् पशुः पुच्‍छ विषाणहीनः ॥

रवीन्द्रनाथ ठाकुर के मुख से निकला “कला में मनुष्‍य अपने भावों की अभिव्‍यक्ति करता है ” तो प्लेटो ने कहा – “कला सत्‍य की अनुकृति की अनुकृति है।”

कला एक प्रकार का कृत्रिम निर्माण है जिसमे शारीरिक और मानसिक कौशलों का प्रयोग होता है।

भारतीय संस्‍कृति में लोक कलाओं की खुश्बू की महक आज भी अपनी प्राचीन परम्‍परा से समृद्ध है। जिस प्रकार आदिकाल से अब तक मानव जीवन का इतिहास क्रमबद्ध नहीं मिलता उसी प्रकार कला का भी इतिहास क्रमबद्ध नहीं है, परन्‍तु यह निश्चित है कि सहचरी के रूप में कला सदा से ही साथ रही है। लोक कलाओं का जन्‍म भावनाओं और परम्‍पराओं पर आधारित है क्‍योंकि यह जनसामान्‍य की अनुभूति की अभिव्यक्ति है। यह वर्तमान शास्त्रीय और व्‍यावसायिक कला की पृष्‍ठभूमि भी है।  

हमारी संस्‍कृति के इन तत्त्वों को प्राचीन काल से लेकर आज तक की कलाओं में देखा जा सकता है। इन्‍हीं ललित कलाओं ने हमारी संस्‍कृति को सत्‍य, शिव, सौन्‍दर्य जैसे अनेक सकारात्‍मक पक्षों को चित्रित किया है। इन कलाओं के माध्‍यम से ही हमारा लोकजीवन, लोकमानस तथा जीवन का आं‍तरिक और आध्‍यात्मिक पक्ष अभिव्‍यक्‍त होता रहा है।  

ट्रेडिशनल कला के विषय में मैंने मेरे पहले ब्लोग ‘इंडियन ट्रेडिशनल आर्ट ‘ में विस्तार से चर्चा की है।

आधुनिक कला १८६० से 1970 के दशक से विस्तारित अवधि के दौरान किए जाने वाले कलात्मक कार्यों का संदर्भ देता है और उस युग की शैली और दर्शन को दर्शाता है। सामान्यतः यह शब्द अतीत की परम्पराओं को पीछे छोड़ते हुए प्रयोग करने की भावना से संबद्ध है। आधुनिक कलाकारों ने देखने के नए तरीकों और सामग्रियों और कला के कार्यों की प्रवृति पर नए विचारों के साथ प्रयोग किए। कल्पनात्मकता की ओर झुकाव आधुनिक कला की विशेषता है। सबसे नवीनतम कलात्मक कला को अक्सर समकालीन कला या पश्च-आधुनिक कला कहा जाता है।

वस्तुतः जैसे विज्ञान विविध खोजों से आगे बढता है और तभी तक वह विज्ञान है जब तक वह आगे बढ़ रहा है -वैसे ही कला भी निरंतर आगे बढ़ने का नाम है। निश्चित ही यहाँ हमारे पुराने मूल्य व सँस्कृति का किसी भी प्रकार उल्लंघन न हो बल्कि हो सके तो हमें उसका आधुनिक रूप में समावेश करना चाहिए। लेकिन मेरे विचार से रुढिवादिता के कारण यदि हम आधुनिक शैली को नहीं अपनाते हैं तो उसी प्रकार पीछे रह जायेंगे जेसे बिना आधुनिक विज्ञान के प्रयोगों के समाज व् अर्थव्यवस्था । अब जैसे स्वदेशी हमारे लिए अच्छा है उससे हम आत्म निर्भर बनते हैं लेकिन आधुनिक संसाधनों से हम सम्रद्ध भी बनते हैं । इसी प्रकार कला में भी सोच समझ कर हमें आगे बढ़ना चाहिए और बजाय अनावश्यक आलोचना के आधुनिकता का स्वागत करना चाहिए।  

उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कलकत्ता में भारतीय चित्रकला में आधुनिक भारतीय कला आंदोलन शुरू हो गया था   । चित्रकला की पुरानी परंपरायें  ख़त्म हो गई थीं।   

 बंगाल में  कला के नए स्कूल अंग्रेजों द्वारा शुरू किए गए थे। प्रारंभ में, भारतीय कला के नायक जैसे राजा रवि वर्मा ने पश्चिमी परंपराओं और तकनीकों पर तेल पेंट और ईज़ेल पेंटिंग सहित तकनीकें खींचीं। 

यद्यपि यह माना जाता है कि आधुनिक मूर्तिकला और वास्तुकला का उद्धभव उन्नीसवीं सदी के अंत में हुआ था, आधुनिक चित्रकला की शुरुआत ठीक इससे पहले हुई थी। पश्चिम में भारतीय आध्यात्मिक विचारों के व्यापक प्रभाव के बाद, ब्रिटिश कला शिक्षक अर्नेस्ट बिनफील्ड हवेल ने छात्रों को मुगल लघुचित्रों की नकल करने के लिए प्रोत्साहित करके कलकत्ता स्कूल ऑफ आर्ट में शिक्षण विधियों में सुधार करने का प्रयास किया। इसने अत्यधिक विवाद पैदा किया, जिसके कारण स्थानीय प्रेस से छात्रों और शिकायतों की हड़ताल हुई, जिसमें राष्ट्रवादियों ने भी इसे एक प्रगतिशील कदम माना। हावेल कवि रवींद्रनाथ टैगोर के एक भतीजे कलाकार अबानिंद्रनाथ टैगोर द्वारा समर्थित था।

अबानिंद्रनाथ ने मुगल कला से प्रभावित कई कामों को चित्रित किया, एक शैली है कि वह और हवेल का अभिव्यक्ति माना जाता है इंडिया पश्चिम के “भौतिकवाद” के विरोध में, विशिष्ट आध्यात्मिक गुण हैं। उनकी सबसे प्रसिद्ध पेंटिंग, भारत माता (मदर इंडिया) ने एक युवा महिला को चित्रित किया, जिसमें हिंदू देवताओं के तरीके में चार हथियारों के साथ चित्रित किया गया था, जिसमें वस्तुएं थीं इंडिया राष्ट्रीय आकांक्षाएं। बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट के अन्य प्रमुख आंकड़े गगनेंद्रनाथ टैगोर, अबानिंद्रनाथ के बड़े भाई, जामिनी रॉय, मुकुल डे, मनीशी डे और राम किन्कर बाईज थे, जो आधुनिक भारतीय मूर्तिकला के अग्रणी के रूप में प्रसिद्ध हैं।

आजादी के बाद के समय तक आजादी 1947 में, कला के कई स्कूलों में इंडिया आधुनिक तकनीकों और विचारों तक पहुंच प्रदान की गई। इन कलाकारों को प्रदर्शित करने के लिए गैलरी स्थापित की गई थीं। आधुनिक भारतीय कला आमतौर पर पश्चिमी शैलियों का प्रभाव दिखाती है, लेकिन अक्सर भारतीय विषयों और छवियों से प्रेरित होती है।  

प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप, जल्द ही स्थापित हुआ , जिसका उद्देश्य व्यक्त करने के नए तरीकों को स्थापित करना था । इसके संस्थापक फ्रांसिस न्यूटन सूजा और एसएच रजा, एमएफ हुसैन और मनीशी डे शुरुआती सदस्य थे। यह भारतीय कला के मुहावरे को बदलने में गहरा प्रभावशाली था। लगभग सभी प्रमुख कलाकारों इंडिया 1950 के दशक में समूह के साथ जुड़े थे। उनमें से प्रमुख अकबर पदमसी, सदानंद बकरे, राम कुमार, तैयब मेहता, केएच आरा, एचएड और बाल चब्दा थे। 1950 में, वीएस गायतोंडे, कृष्ण खन्ना और मोहन सामंत समूह में शामिल हो गए। समूह 1956 में विघटित हुआ।

1970 से कलाकारों ने अपने वातावरण का आलोचनातमक दृष्टि से सर्वेक्षण करना प्रारंभ किया। गरीबी और भ्रष्टाचार की दैनिक घटनाएँ, अनैतिक भारतीय राजनीति, विस्फोटक साम्प्रदायिक तनाव, एवं अन्य शहरी समस्याएँ अब उनकी कला का विषय बनने लगीं। देवप्रसाद राय चौधरी एवं के सी एस पणिकर के संरक्षण में मद्रास स्कूल ऑफ आर्ट संस्था स्वतन्त्रतोत्तर भारत में एक महत्त्वपूर्ण कला केन्द्र के रूप में उभरी और आधुनिक कलाकारों की एक नई पीढ़ी को प्रभावित किया।

आधुनिक भारतीय चित्रकला के रूप में जिन कलाकारों ने अपनी पहचान बनाई, वे हैं- तैयब मेहता, सतीश गुजराल, कृष्ण खन्ना, मनजीत बाबा, के जी सुब्रह्मण्यन, रामकुमार, अंजलि इला मेनन, अकबर पप्रश्री, जतिन दास, जहांगीर सबावाला तथा ए. रामचन्द्रन आदि। भारत में कला और संगीत को प्रोत्साहित करने के लिए दो अन्य राजकीय संस्थाएँ स्थापित हुई-

(1) नेशनल गैलरी ऑफ माडर्न आर्ट- इसमें एक ही छत के नीचे आधुनिक कला का एक बहुत बड़ा संग्रह है।

(2) ललित कला अकादमी- जो सभी उभरते कलाकारों को विभिन्न कला क्षेत्रों में संरक्षण प्रदान करती है और उन्हें एक नई पहचान देती है।👉क्या ये ब्लॉग किसी भी प्रकार से आपके लिए सहायक है या आपके सुझाव इस विषय में क्या हैं  … और आप आगे किन विषयों पर ब्लॉग पढ़ना चाहते हैं  … कृपया अपने महत्वपूर्ण सुझाव दीजिये 🙏

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विद्या ददाति विनयं,

विनयाद् याति पात्रताम्।

पात्रत्वात् धनमाप्नोति,

धनात् धर्मं ततः सुखम्॥

सामान्य हिन्दी भावार्थ:

विद्या विनय देती है, विनय से पात्रता आती है, पात्रता से धन आता है, धन से धर्म होता है, और धर्म से सुख प्राप्त होता है।

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यहां सबसे पहले हम यह समझने का प्रयास करेंगे कि विद्या क्या है ? क्या जो जानकारी हमें प्राप्त होती हैं उसे ही विद्या कहते हैं?

 तो ज्यातर हम पाएंगे की अधिक जानकारी वाले व्यक्तित्व या जो लोग अधिक जानकारी वाले होते हैं, उनमें अपनी जानकारी का उतना ही घमण्ड होता है।  

अब पात्रता से क्या अर्थ है , और धन भी क्या वहीं है ? जो हमें समझ में आता है।  और तो और -धन से धर्म – यह तो बहुत ही बड़ा प्रश्न खड़ा करता है।  

और धन से नहीं अपितु धर्म से सुख। 

आज के युग में जब हर कोई अपने जीवन को अधिक से अधिक समृद्ध बनाने की दौड़ में लगा है , तब हमें दिन पर दिन दुःखी करोड़ पति और अरब पति अधिक दिखाई देते हैं। 

एक रिक्शे वाला दिन भर रिक्शा चलाएगा रात को थोड़ी सब्जी घर ले के जायेगा , बीबी बच्चों के साथ खायेगा और बहुत ख़ुशी ख़ुशी अपना जीवन बिताएगा , उसे फुर्सत ही नहीं दुखी होने के लिए। 

कुछ बहुत अपमान जनक हो जायेगा तो खुद को ज्यादा सही से सांत्वना दे पायेगा बजाय के उस व्यक्ति के जो बहुत अमीर होगा।  

कोई भी कार्य से पहले धर्म का विचार शायद एक अमीर की अपेक्षा एक गरीब ज्यादा करेगा। 

मुझे याद आता है कि – मेरे यहां घरेलू काम करने वाली लड़की को जब मैंने पूछा  कि क्या वह मेरी मित्र के यहां भी काम कर देगी तो उसने कहा कि वहां कोई और कार्यरत है और वह किसी और का काम छीन कर कार्य करने की इच्छुक नहीं है।   जब कि हम रोज किसी न किसी से काम छीनते ही रहते हैं। 

सोचेंगे तो हमारे पास बहुत तर्क होंगे पर हम उसकी अपनी समझ देखेंगे तो पायेंगे कि हमने इस बारे में कभी सोचा तक नहीं। 

मेरे विचार से विद्या का सम्बन्ध जानकारियों से न होकर ज्ञान से है जो तत्व का बोध कराती है।  यहां आप ईश्वर की न भी बात करना चाहें तो भी स्वयं को तो अस्तित्व में पाते ही हैं , वरना क्या समझना है और किसको समझना है ?

वैसे आज ऐसी पीढ़ी की भी कमी तो नहीं जो कहती है कि जानने की कोई जरूरत नहीं है हमें। 

यदी आप सही से अपने धर्म का सहज निर्वाह कर रहे हैं और खुश हैं – तो सच में कोई आवश्यकता नहीं। 

लेकिन जैसे अगर हमें कोई बीमारी है तो सबसे पहले हमें हमें स्वीकार करना पड़ता है कि हम बीमार हैं तभी तो इलाज कराएँगे ऐसे ही –

ज्ञान या विद्या क्या है ये हम नहीं जानते और कैसे जान सकते हैं ये समझने के लिए हमें उत्सुक होना होगा .. 

जैसे न्यूटन के मन में हुआ कि यह फल नीचे ही क्यों गिरता है ; यह शुरुवात होती है किसी भी विषय को गहराई से जानने  के लिए। 

अभी यहां इस विषय को समझने के लिए मैं आपको मेरे ही दूसरे ब्लॉग पर जाने के लिए आग्रह करुँगी – 

अपने को जानो

यहां हमने आत्म ज्ञान के विषय में क्या नहीं होता है, कुछ दूर तक चर्चा की।  जैसे आप जानते हैं कि दूध में घी या पनीर है ही या कि धुएँ में अग्नि है ही ऐसे ही सारी श्रष्टि में केवल एक एनर्जी या शक्ति ही काम कर रही है।  

यद्यपि यह वह विषय है जिसके विषय में वेदों ने भी नेति नेति कहा है तो मैं क्या कहूँ? ,

 जानने वाले व्यक्ति को इस विषय में “ऐसा नहीं है” इतना ही कह पाते हैं। 

फिर भी जैसे बंधी हुई नाव में चप्पू चलाने से वह कहीं नहीं पहुँचती ऐसे ही –

                    छिन्नसंशयः 

शंशय के नाश हुए बिना इस श्लोक की शुरुवात भी नहीं होगी।  

हाँ यहाँ ये ध्यान देने योग्य है कि मैं किसी भी प्रकार की धार्मिक या सांप्रदायिक प्रथाओं का विरोध बिल्कुल नहीं कर रही वल्कि वो सब हजारों रास्ते हैं हमारे इस एक मंजिल तक पहुँचने के लिए।  

पर जैसे दिमाग लगा कर हम दिमाग को शान्त नहीं कर सकते ऐसे ही संसार की महत्ता को मानते हुए इसकी असत्यता पर विश्वास नहीं हो  सकता।

यद्यपि यहां फिर एक विरोधाभास प्रतीत हो रहा है – कि कुआ जैसा होगा पानी भी तो वैसा ही होगा , यानि हम सत्य की संतान असत्य कैसे हो सकते हैं।  

इसके विषय में श्रीमद भागवत में सही है – 

ज्ञानं परमगुह्यं मे यद् विज्ञानसमन्वितम् ।

सरहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया ॥ 

जो मूल तत्व को छोड़ कर प्रतीत होता है और आत्मा में प्रतीत नहीं होता , उसे आत्मा की माया समझो।  जैसे (वस्तु का) प्रतिबिम्ब अथवा अंधकार (छाया)होता है।  

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 यह बहुत ही गूढ़ विषय है। 

मैं भी आपके साथ यात्रा में ही हूँ लेकिन कहीं अगर आभास हो पाया हो कि विद्या क्या हो सकती है तो निश्चित ही हम विनय , पात्रता , धन , धर्म और फिर अंत में – 

“पायो परम विश्राम “

को भी समझ पाएंगे।  अर्थात सुःख क्या है समझ पाएंगे। 

यद्यपि अपनी समझ से कुछ कहना तो चाहती हूँ पर अभी मुझे लगता है कि मैं जब तक पहला अध्याय नहीं समझ लूँ  तब तक बाकि के विषय में क्या कहूं।  

शेष शुभ 🙏

विद्या ददाति विनयं

अपने को जानो

My interview is Published in – Carlisle PA 17013-3013 – U.S.A. online Magazine –
https://www.artsillustrated.com/riddhima-sharraf-artist/